Tuesday, May 21

बडबड






गुज़रे महीनो मे कई दफा सोचा की कुछ लिखता हूँ 
पर सच कहूं तो ये सोच कर नही लिखा की 
इस बडबड को क्या नाम दूंगा दूंगा 
और इतेफाक देखिये आज लिखा भी तो क्या बडबड है 

ख़ुशी मेरे अल्फाजों मे  बयान नही होती 
मेरा ताल्लुक तो हमेशा गम और आंसुओं को जुबान देने से रहा है 
और दुःख कोई ऐसा महसूश नही होता अब 
सच ही है MACHINES को कुछ महसूस ही कहा होता है 



कुछ चूका हुआ सा महसूस करता हूँ आजकल 
कुछ खोया खोया खोया, थोडा सा बेसुध भी 
जैसे ज़िन्दगी के पहाड़े भूल गया हूँ और 
बस घुटी घटी सी धुन याद है उनकी 

जब कोई सवालात करता है 
5 एकुम 5 ,5 दूनी दस और उसके बाद 
बस एक रटी  रटाई धुन में शुरू हो जाता हूँ 
कई मरतबा तो ये नही समझ आता की 
धोखा  खुद को दे रहा हूँ या उससे जिसने सवाल किया था 


सोचा था की जब खुद के पैसे होंगे तो बहुत ऐश करूँगा 
सारे सपने पूरे करूँगा अपने 
कमबख्त इस नौकरी मे  तो सोने का भी वक़्त नही मिलता 
सपने तो छोडो , जरूरते भी आजकल पूरी नही होती 


कभी कभी लगता है की अँधेरी सुरंग मे दौड़ रहा हूँ 
वापस जा नही सकता क्योकि जिससे भागना शुरू किया था 
वो डर वो हौवा अभी भी वही होगा 
और आगे तो खैर अँधेरा ही हैं 
अब तो पाँव भी दुखने लगे है 















No comments:

Copyright

myfreecopyright.com registered & protected